सोच का विकास और विस्तार मातृभाषा में ही हो सकता है क्योंकि जो नए विचार हमें आते हैं वह सभी हमें अपनी मातृभाषा में ही आते हैं। जो बात हम अपनी मातृभाषा में कह सकते हैं वह हम विश्व की किसी और भाषा में नहीं कह सकते। क्योंकि कोई भी सीखी हुई भाषा हमारे दिल से नहीं निकलती वह सिपर्फ दिमाग से निकलती है।
अध्कितर भाषा विज्ञानियों का मानना है कि अपनी सोच या विचारों को जितना अच्छा अपनी मातृभाषा में व्यक्त किया जा सकता है उतना अच्छा किसी भाषा में नहीं किया जा सकता। ज्ञान विज्ञान की बात आप अपनी भाषा में जितनी अच्छी तरह से कह सकते हैं, उतनी आसानी से आयातित भाषाओं में नहीं कह सकते। मातृभाषा का अपना महत्त्व है। जब भी हम कुछ लिखने बैठते हैं तो एक दृश्य को लिपिब( करने के लिए कई शब्द उभर कर सामने आते हैं तो वह मातृभाषा में ही होते हैं। लेकिन दूसरी भाषा में एक या दो शब्दों से ज्यादा सामने नहीं आते। यदि हम किसी और भाषा में लिखते हैं तो हमें उन शब्दों का अनुवाद दूसरी भाषा में करना पड़ता है।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम जन्म के समय से ही अपनी मातृभाषा को अंगीकार करते हैं और जाने अनजाने में बहुत से शब्द सीख जाते हैं। वहीं किसी दूसरी भाषा के शब्द हम चाह कर भी सीख नहीं पाते क्योंकि वे शब्द हमारे वातावरण में प्रचलन में नहीं होते। एक व्यक्ति तो दूसरी भाषा सीख सकता है लेकिन पूरा परिवार या आस-पड़ौस नहीं। इसी वजह से मातृभाषा ही सर्वाेत्तम है नए शब्दों को सीखने के लिए और उन्हें अपनाने के लिए।
हिन्दी हमारी मातृभाषा है और भाषा विज्ञानियों का कहना है कि हिन्दी एक वैज्ञानिक भाषा है जिसे जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा जाता है और जैसा लिखा जाता है वैसा ही बोला जाता है। लेकिन कई भाषाएं ऐसी हैं जिनका उच्चारण कुछ है और लिखा कुछ और जाता है।
कुछ लोग हिंदी को रोमन लिपि में लिखने की वकालत करते हैं लेकिन लिपि और भाषा का संबंध् भाववाचक होता है। हिंदी किसी भी मायने में दूसरी भाषा से कमतर नहीं है। इसकी अपनी एक परंपरा रही है। बड़े-बड़े लेखक हुए हैं, लिखने और पढ़ने वालों की तादाद भी अध्कि रही है। यह करोड़ो लोगों की भाषा है और हिन्दी क्यों बदले अपनी लिपि। यह कोई व्यवहारिक बात नहीं है। और जहां तक रोमन भाषा है वह बहुत ज्यादा वैज्ञानिक नहीं है।
आजकल देवनागरी लिपि को रोमन लिपि में लिखने का चलन है। नए युग के निर्देशक और अभिनेता हिन्दी पिफल्मो में काम तो करते हैं लेकिन हिन्दी उन्हें आती नहीं है। वह लोग हिन्दी को रोमन लिपि में लिखते हैं। टीवी और पिफल्मों में भाषा के लिए कहा जाता है कि भाषा आम बोलचाल की होनी चाहिए न कि क्लिष्ट।
यह सही है कि जो भाषा हमें सही से आती है हमें उसी में कार्य करना चाहिए लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सोच का विकास और विस्तार मातृभाषा में ही हो सकता है।
अध्कितर भाषा विज्ञानियों का मानना है कि अपनी सोच या विचारों को जितना अच्छा अपनी मातृभाषा में व्यक्त किया जा सकता है उतना अच्छा किसी भाषा में नहीं किया जा सकता। ज्ञान विज्ञान की बात आप अपनी भाषा में जितनी अच्छी तरह से कह सकते हैं, उतनी आसानी से आयातित भाषाओं में नहीं कह सकते। मातृभाषा का अपना महत्त्व है। जब भी हम कुछ लिखने बैठते हैं तो एक दृश्य को लिपिब( करने के लिए कई शब्द उभर कर सामने आते हैं तो वह मातृभाषा में ही होते हैं। लेकिन दूसरी भाषा में एक या दो शब्दों से ज्यादा सामने नहीं आते। यदि हम किसी और भाषा में लिखते हैं तो हमें उन शब्दों का अनुवाद दूसरी भाषा में करना पड़ता है।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम जन्म के समय से ही अपनी मातृभाषा को अंगीकार करते हैं और जाने अनजाने में बहुत से शब्द सीख जाते हैं। वहीं किसी दूसरी भाषा के शब्द हम चाह कर भी सीख नहीं पाते क्योंकि वे शब्द हमारे वातावरण में प्रचलन में नहीं होते। एक व्यक्ति तो दूसरी भाषा सीख सकता है लेकिन पूरा परिवार या आस-पड़ौस नहीं। इसी वजह से मातृभाषा ही सर्वाेत्तम है नए शब्दों को सीखने के लिए और उन्हें अपनाने के लिए।
हिन्दी हमारी मातृभाषा है और भाषा विज्ञानियों का कहना है कि हिन्दी एक वैज्ञानिक भाषा है जिसे जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा जाता है और जैसा लिखा जाता है वैसा ही बोला जाता है। लेकिन कई भाषाएं ऐसी हैं जिनका उच्चारण कुछ है और लिखा कुछ और जाता है।
कुछ लोग हिंदी को रोमन लिपि में लिखने की वकालत करते हैं लेकिन लिपि और भाषा का संबंध् भाववाचक होता है। हिंदी किसी भी मायने में दूसरी भाषा से कमतर नहीं है। इसकी अपनी एक परंपरा रही है। बड़े-बड़े लेखक हुए हैं, लिखने और पढ़ने वालों की तादाद भी अध्कि रही है। यह करोड़ो लोगों की भाषा है और हिन्दी क्यों बदले अपनी लिपि। यह कोई व्यवहारिक बात नहीं है। और जहां तक रोमन भाषा है वह बहुत ज्यादा वैज्ञानिक नहीं है।
आजकल देवनागरी लिपि को रोमन लिपि में लिखने का चलन है। नए युग के निर्देशक और अभिनेता हिन्दी पिफल्मो में काम तो करते हैं लेकिन हिन्दी उन्हें आती नहीं है। वह लोग हिन्दी को रोमन लिपि में लिखते हैं। टीवी और पिफल्मों में भाषा के लिए कहा जाता है कि भाषा आम बोलचाल की होनी चाहिए न कि क्लिष्ट।
यह सही है कि जो भाषा हमें सही से आती है हमें उसी में कार्य करना चाहिए लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सोच का विकास और विस्तार मातृभाषा में ही हो सकता है।
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